भारत-पाकिस्तान: टकराव का लंबा सिलसिला और हालिया तनाव

India Pakistan War

भारत और पाकिस्तान। दो पड़ोसी, दो देश, पर एक दर्दनाक इतिहास और जटिल वर्तमान के धागों से बंधे। 1947 में विभाजन की त्रासदी के बाद से ही दोनों देशों के रिश्तों पर संघर्ष और अविश्वास का साया रहा है। हालांकि, पारंपरिक अर्थों में 1971 के बाद कोई बड़ा युद्ध (जमीनी या हवाई सेनाओं का बड़े पैमाने पर टकराव) नहीं हुआ है, लेकिन तनाव, सीमा पर झड़पें, और ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी आतंकवाद के जरिए संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। आइए, इस जटिल रिश्ते के हाल के अध्यायों को समझने की कोशिश करें।

झलक इतिहास की: युद्धों का सिलसिला

  • 1947-48 का युद्ध: विभाजन के तुरंत बाद कश्मीर को लेकर पहला युद्ध। इसके परिणामस्वरूप कश्मीर का विभाजन हुआ और ‘नियंत्रण रेखा’ (LoC) अस्तित्व में आई।
  • 1965 का युद्ध: फिर कश्मीर को केंद्र में रखकर लड़ा गया युद्ध। दोनों देशों को भारी नुकसान हुआ।
  • 1971 का युद्ध: यह सबसे निर्णायक युद्ध रहा। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत के हस्तक्षेप के बाद शुरू हुए इस युद्ध में पाकिस्तान की करारी हार हुई और बांग्लादेश का जन्म हुआ।
  • 1999 का कारगिल युद्ध: यह अब तक का आखिरी बड़ा पारंपरिक संघर्ष था। पाकिस्तानी सेना और घुसपैठियों ने कारगिल की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ चलाकर बहादुरी से इन चोटियों को वापस छीना। यह युद्ध परमाणु हथियारों से लैस दोनों देशों के बीच खतरनाक टकराव था।

कारगिल के बाद का दौर: युद्ध नहीं, पर तनाव कम नहीं

1999 के बाद पारंपरिक युद्ध तो नहीं हुआ, लेकिन तनाव और संघर्ष के नए रूप सामने आए:

  1. सीमा पर लगातार गोलीबारी (सीजफायर उल्लंघन): नियंत्रण रेखा (LoC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा (IB) पर गोलीबारी और मोर्टार हमले आम हो गए। इसमें दोनों तरफ के सैनिक और आम नागरिक शहीद होते रहे। यह तनाव बढ़ाने और दबाव बनाए रखने का एक स्थायी तरीका बन गया।
  2. आतंकवाद: प्रॉक्सी वॉर का हथियार: भारत का मुख्य आरोप रहा है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई, कश्मीर और भारत के अन्य हिस्सों में सक्रिय आतंकवादी गुटों को प्रशिक्षण, हथियार और धन मुहैया कराती है। इसका उद्देश्य भारत को अंदर से कमजोर करना और कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना है।
    • 2001 भारतीय संसद पर हमला: पाकिस्तान आधारित आतंकवादी गुटों जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा ने हमला किया। इससे दोनों देश युद्ध के कगार पर पहुंच गए।
    • 2008 मुंबई हमले (26/11): यह सबसे बर्बर आतंकवादी घटना थी। पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने मुंबई में भीषण हमला किया, जिसमें 166 निर्दोष लोग मारे गए। इस घटना ने दोनों देशों के रिश्तों को बहुत नीचे गिरा दिया और भारत का पाकिस्तान के प्रति गुस्सा चरम पर पहुंचा।
  3. सर्जिकल स्ट्राइक्स और एयर स्ट्राइक्स: भारत की नई रणनीति:
    • 2016 उरी हमला: पाकिस्तानी आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर के उरी में भारतीय सेना के कैंप पर हमला किया, जिसमें 19 जवान शहीद हुए।
    • सर्जिकल स्ट्राइक्स (2016): उरी हमले के जवाब में, भारतीय सेना ने पहली बार ‘सर्जिकल स्ट्राइक्स’ की रणनीति अपनाई। भारतीय कमांडो ने नियंत्रण रेखा पार करके पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में घुसकर आतंकवादी लॉन्च पैड्स को नष्ट किया। इसने एक स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अब सीधे कार्रवाई करने से नहीं हिचकिचाएगा।
    • 2019 पुलवामा आत्मघाती हमला: जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी ने CRPF के काफिले पर हमला किया, जिसमें 40 से अधिक जवान शहीद हुए। यह घटना देश के लिए एक बड़ा झटका थी।
    • बालाकोट एयर स्ट्राइक (2019): पुलवामा हमले के बाद, भारतीय वायुसेना ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। भारतीय लड़ाकू विमानों ने नियंत्रण रेखा पार की और पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के सबसे बड़े आतंकवादी प्रशिक्षण कैंप पर बमबारी की। भारत ने दावा किया कि यह ‘प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक’ थी और बड़ी संख्या में आतंकवादी मारे गए।
    • पाकिस्तान की प्रतिक्रिया और डाउनिंग ऑफ एमआई-21 (2019): बालाकोट स्ट्राइक के अगले दिन, पाकिस्तानी वायुसेना ने भारतीय हवाई क्षेत्र में घुसपैठ की कोशिश की। इस हवाई टकराव में भारत का एक मिग-21 विमान (पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान) गिरा और पाकिस्तान की कैद में चला गया। भारत ने भी एक पाकिस्तानी F-16 विमान गिराने का दावा किया। विंग कमांडर अभिनंदन को बाद में पाकिस्तान ने रिहा किया। यह घटना दोनों देशों को परमाणु युद्ध के कगार तक ले गई।

वर्तमान स्थिति: शांति की नाजुक उम्मीद?

  • फरवरी 2021 की सीजफायर सहमति: एक बड़ा बदलाव फरवरी 2021 में आया, जब दोनों देशों के सेना प्रमुखों ने सीजफायर का पालन करने पर सहमति जताई। इसके बाद से नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी में उल्लेखनीय कमी आई है, जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों को राहत मिली है।
  • लेकिन, मूलभूत मुद्दे बने हुए हैं: कश्मीर विवाद, पाकिस्तान का भारत-विरोधी आतंकवादी गुटों को समर्थन देने का आरोप, और दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास जस का तस बना हुआ है। राजनयिक संबंध अभी भी ठंडे हैं।
  • आतंकवाद का खतरा बरकरार: भारत लगातार कहता है कि जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से आतंकवादी गतिविधियों को पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक स्थायी शांति संभव नहीं है। हालिया वर्षों में भी कश्मीर घाटी में आतंकवादी घटनाएं जारी हैं, जिससे तनाव बना हुआ है।
  • परमाणु कारक: दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं। यही कारण है कि पारंपरिक युद्ध की संभावना कम है, लेकिन किसी बड़े आतंकवादी हमले या गलतफहमी के कारण हिंसा का बढ़ना और उसके बाद के एस्कलेशन (हिंसा में वृद्धि) का खतरा हमेशा बना रहता है। यह पूरे क्षेत्र के लिए एक बड़ा जोखिम है।

निष्कर्ष: शांति की राह चुनौतीपूर्ण, लेकिन जरूरी

भारत और पाकिस्तान के बीच कोई “हालिया युद्ध” नहीं हुआ है। कारगिल 1999 के बाद दोनों सेनाएं आमने-सामने नहीं आई हैं। हालांकि, 2019 की घटनाएं (बालाकोट एयर स्ट्राइक और उसके बाद की हवाई टकराव) बेहद तनावपूर्ण थीं और दोनों देश युद्ध के बेहद करीब पहुंच गए थे। ये घटनाएं दिखाती हैं कि कैसे आतंकवाद एक ट्रिगर बन सकता है और कैसे दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है।

फरवरी 2021 की सीजफायर सहमति एक सकारात्मक कदम है, जिसने सीमावर्ती जनजीवन में शांति लाई है। लेकिन, यह एक पेंचदार रास्ते पर पहला कदम मात्र है। स्थायी शांति के लिए मूलभूत मुद्दों – खासकर कश्मीर और आतंकवाद पर बातचीत की जरूरत है। दोनों देशों को आपसी अविश्वास को कम करने और जन-से-जन संपर्क बढ़ाने के लिए प्रयास करने होंगे।

इतिहास गवाह है कि युद्ध से केवल विनाश होता है। लाखों लोग विस्थापित हुए, परिवार बिछड़े, और अर्थव्यवस्थाएं चौपट हुईं। दोनों देशों की जनता, खासकर युवा पीढ़ी, विकास, शिक्षा और बेहतर जीवन की आकांक्षा रखती है। यह तभी संभव है जब शांति और स्थिरता का वातावरण बने।

भारत-पाकिस्तान संबंधों की राह बेहद पथरीली है। 2019 जैसी घटनाएं एक कड़ी चेतावनी हैं कि तनाव किसी भी समय बेकाबू हो सकता है। सीजफायर का पालन एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन असली चुनौती इस नाजुक शांति को कायम रखने और उसे मजबूत बनाने की है। यह तभी होगा जब दोनों देशों की सरकारें वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए, आतंकवाद पर सख्ती से नियंत्रण करेंगी और बातचीत की मेज पर बैठने के लिए तैयार होंगी। दक्षिण एशिया की शांति और समृद्धि इसी में निहित है।

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